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Short Stories In Hindi

दीया तेल का

घनघोर अँधेरे के छोटे से घर में अमित बारिश से भीगता हुआ झोपड़ी के गेट के  बराबर गेट से अपनी गर्दन नीचे की ओर झुकाए अंदर घुसता है अपने गीले बालों पे हाथ फिराता हुआ पुकारता है माँ सुनो
आज दूसरी कंपनी में इंटरव्यू देकर आया हूँ
कहते हुए अपने बेग को सामने पड़ी टूटी सी कुर्सी पर रखता है और उसमे से एक मिठाई का डब्बा निकालता है
माँ अपने हाथ पौन्छ्ते हुए आती है,इतने में अमित डब्बा सामने करता हुआ मुझे नौकरी पर रख लिया है 20 हजार महीने के पगार पर।
पर बेटा इसकी क्या जरुरत थी
ये पैसे कहीं ओर काम आ जाते ,तुम अकेले ही तो कमाने वाले हो और अभी कितना उधार बाकि है सब तुझे ही चुकाना है
सब हो जाएगा माँ बस आप जल्दी से खाना लगा दो
बहुत भूख लगी है मैं तब तक पापा के पास जाकर आता हूँ
अभी लगाती हूँ बेटा
माँ रसोई में जाती है एक कोने में तेल का दीया जला हुआ है जो जितना हो सकता है उतना अँधेरे को दूर करने की कोशिश कर रहा  है । अमित की माँ तीन चार अलग अलग बर्तनों में से चावल सब्जी और रोटी निकालकर  इक थाली में डालती है ।उधर अमित एक छोटे से कमरे में घुसता है जहाँ पर पुरानी चारपाई पे उसके पिता लेते हुए होते है बिलकुल कमजोर और की उम्र के करीब ,अमित उनके पैर छूता है और जॉब की खुशखबरी सुनाता है वो खुश होकर उसके सर पर हाथ रखा देते है,अमित उनको खाना खा लिया पुछता है और उसके पिता हामी भर देते है। फिर अमित की माँ उसे पुकारती है और अमित हाथ धोकर खाना खाने बैठ जाता है उसके माँ उसके साथ बैठी होती है अमित कहता है माँ अब अच्छी तनखवाह है अब हम किराए पे घर ले लेंगे कब तक इस अँधेरे घर में वक्त बिताओगी माँ । खाना खा लिया जाता है और ऐसे ही अच्छे भविष्य की बातें करते रहते है ।ये सारी बातें रसोई में जल रहा दीया सुन रहा होता है,उसे लग रहा होता है कि उसकी अब ज्यादा जरुरत नहीं है,यह सोचता हुआ ओर दिनों की बजाय वह अपने आपको जल्दी बुझा लेता है यह सोचते हुए कि अब शायद ही फिर जगना पड़े और बुझी हुई लौ में अपनी निशानी छोड़ देता है।
अगली सुबह फिर नया सिलसिला शुरू होता है ।अमित सुबह हल्का फुल्का नाश्ता करके जॉब के लिए निकल जाता है,उसकी माँ उसके पिता को खाना देकर अपने घर के कामों लग जाती है,सब कुछ बिलकुल पहले जैसा होता है सबके चेहरे पे खुशी की झलक है अमित की माँ मोहल्ले की अपनी सहेलियों को अमित की नौकरी की बात बता रही होती है ।अमित के पिता भी बिस्तर में लेटे मुस्कुरा रहे हैं ।पर वो अकेला जो पूरी रात रोकर बुझ चुका है उसके ऊपर किसी का ध्यान नहीं है।शायद अब उसकी जगह अच्छी रौशनी वाली टयूबलाईट ले लेगी और उसे किसी कचरे के ढेर में फेंक दिया जाएगा। ऐसे ही जाने कितने दीए यूं ही बुझ गए है।

और कुछ ना कहा जाएगा…..
दोपहर का वक्त
दूर तक फैली हुई धूप,झुलसा देने वाली गर्मी के होते सुनसान-सी गलियां,चारों तरफ सन्नाटा ,इन गलियों से थोड़ी दूर नीम के पेड़ की छांव के नीचे तालाब किनारे अक्षयत की गोद में लैटी श्रेया ।
अक्षयत -(श्रेया से) अच्छा एक बात पूछूं तुमसे
श्रेया -(अपनी निगाहों को ऊपर उठाकर हामी भरकर ) हाँ बोलो।
अक्षयत (लंबी सांस भरकर ) वैसे नहीं भी कहूं तो कभी ना कभी ये होना ही है,तुम्हारा ठीक है,ये प्यार रास आ जाता है तुम्हें
हम जैसे दीवाने ही घिसे जाते है हरदम ,अब तुम्हें ही देख लो
कितने यकीन के साथ लैटी हो गोद में खजंर चलाने के बाद
श्रेया(अक्षयत की बाजू को कंधे से पकड़कर उठ जाती है )कैसी बातें कर रहे हो ,मैंनें क्या कर दिया
अक्षयत(अगल-बगल देखकर ) वाह जी वाह बस यही बाकि था किसी का घर बसाने जा रही हो मेरा घर तोड़कर और पूछती हो मैंनें क्या कर दिया
श्रेया (गर्दन झुकाकर धीमे स्वर में ) मैं तुम्हें बताने वाली ही थी
अक्षयत( थोड़ा गुस्से से) कब? जब पूरे जमाने को पता चल जाए तब,सब कहते थे यही होगा,पर मैंनें नहीं माना,भरोसा था न,तुम पर
और देख लो ले डूबा भरोसा मुझे
श्रेया (रोते हुए) तुम्हें तो चैन ही नहीं मिलता मुझे रूलाए बगैर,तुम्हें क्या लगता है मेरे लिए आसान है ये सब
अक्षयत- हाँ नहीं है आसान, पर कितने दिन के लिए २ या ३ उसके बाद फिर वहीं हँसी खुशी सब तुम्हारे पास तो ,
और मेरे साथ क्या होगा पता है मेरा दिल नही टूटा,भरोसा टूटा है,भरोसा समझती हो तुम
अब क्या होगा इससे मेरी जिदंगी में,मैं बताता हूँ किसी ओर से बातें करने तक का मन नहीं करेगा,क्योंकि तुम्हारे लिए तोये एक खेल-सा है पर हमारे लिए नही,
अब अकेला रह नही पाऊँगा।
श्रेया(बात काटते हुए)- हाँ बोलो ,दो दोष मुझे, मेरे हालात तो समझ नही सकते,मेरे ऊपर क्या बीत रही है,मैं चाहती हूँ जितना वक्त तुम्हारे साथ गुजरे उतना ठीक,सारी चीजें तो बदल नहीं सकते हम ।
अक्षयत चुप हो जाता है।
श्रेया- बोलो अब ।तुम हर बार हमें दोष देते हो,तुमने क्या कर दिया प्यार के लिए।
अक्षयत- हमने कुर्बानी दी है हमेशा,दिल पे पत्थर रखा है हमेशा,सुनना चाहती हो सच,तो सुनो,बेवफा हो तुम । तुम्हारी बहन ने बताया मुझे कि कितनी खुश हुई तुम रिश्ता आते ही,वही एक सरकारी पति की लालसा।
कहता भी बहुत और तुम्हें मानता भी बहुत था मैं
पर तुम बेवफा हो इसके अलावा और कुछ नहीं कहा जाएगा।

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