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Deshbhakti Poetry In Hindi

कहाँ आसान थी आजादी,हज़ारों यहाँ सर कटे है
अंग्रेजो के छूटे पसीने जब-जब राजगुरू, सुखदेव भगत सिंह के संग चले है
यूं तो 15 अगस्त हर साल आ जाता है
फिर भी मेरा देश क्यों शहीदों के फन्दे भूल जाता है
यूं तो इंसान हर दिन जीता है अपने हक़ के लिए
फिर क्यों नहीं लड़ता वो अपनी इस माटी के फर्ज के लिए आजादी का असली ये पैगाम तुम हर किसी को बतादो
ओर कोई खामि नहीं है मेरे देश में
बस तुम बेटियों को बचा लो
वो कोमल है मन से, समझ लिया तुमने,
वो सशक्त है तन से भी , ये तुम सबको समझा दो यूं कर बुलन्द अपने आप को कि शोर मचाना ना पड़े
होना है फ़िदा तो हो वतन पे
कि फिर दिल में किसी का ख्याल लाना ना पड़े
बनना है तो हिन्दुस्तान बन ए दोस्त-2
कि किसी के आगे सर झुकाना ना पड़े

मेरी साँसों में बची इसलिए साँसे है
क्योंकि वहाँ बार्डर पर फौजी ने जागकर काटी रातें है
बिस्तर में मुहँ छुपा लेते है जो क्रान्ति की बात सुनकर
उन्हें बता दूं कि ख्वाबों से कुछ नहीं होता
फंदों पे झूलना पड़ता है तब जाकर आजादी आती है

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